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वि॒श्वान॑रस्य व॒स्पति॒मना॑नतस्य॒ शव॑सः । एवै॑श्च चर्षणी॒नामू॒ती हु॑वे॒ रथा॑नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvānarasya vas patim anānatasya śavasaḥ | evaiś ca carṣaṇīnām ūtī huve rathānām ||

पद पाठ

वि॒श्वान॑रस्य । वः॒ । पति॑म् । अना॑नतस्य । शव॑सः । एवैः॑ । च॒ । च॒र्ष॒णी॒नाम् । ऊ॒ती । हु॒वे॒ । रथा॑नाम् ॥ ८.६८.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:68» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:1» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:4


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शिव शंकर शर्मा

पुनरपि इन्द्रनाम से परमात्मा के महिमा की स्तुति करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (शविष्ठ) हे महाबलाधिदेव ! (सत्पते) हे सुजनरक्षक (इन्द्र) हे परमैश्वर्य्यसंयुक्त महेश ! (ऊतये) अपनी-अपनी सहायता और रक्षा के लिये (सुम्नाय) स्वाध्याय, ज्ञान और सुख के लिये (त्वा+आवर्तयामसि) तुझको हम अपनी ओर खेंचते हैं अर्थात् हम पर कृपादृष्टि करने के लिये तेरी प्रार्थना करते हैं। यहाँ दृष्टान्त देते हैं−(यथा+रथम्) जैसे रथ को खेंचते हैं। तू कैसा है, (तुविकूर्मिम्) जिस तेरे अनन्त कर्म हैं (ऋतीसहम्) जो तू निखिल विघ्नों को निवारण करनेवाला है ॥१॥
भावार्थभाषाः - तुवि=बहुत। शविष्ठ=शव+इष्ठ। शव=बल। सब ही उसी की प्रार्थना करें ॥१॥
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शिव शंकर शर्मा

पुनरपीन्द्रनामधेयेन परमात्ममहिम्नः स्तूयते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे शविष्ठ ! महाबलाधि देव ! सत्पते=सतां पालक ! हे इन्द्र=परमैश्वर्य्यसंयुक्त भगवन् ! रथं यथा=रथमिव। ऊतये=रक्षायै। सुम्नाय=स्वाध्याय ज्ञानाय सुखाय च। तुविकूर्मिम्=बहुकर्माणम्। ऋतीसहम्=हिंसकानां दण्डयितारं निखिलविघ्ननिवारकम्। त्वा=त्वाम्। आवर्तयामसि=आवर्तयामः। आकृषाम इत्यर्थः ॥१॥